Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
अकारणं प्रवर्तन्त इव भावा अकारणात् ।
अविद्यमाना अप्येतेऽविद्यमाना इव स्थिताः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
ये जो ज्ञानी के लक्षण बतलाये यये हैं उनकी युक्तिपूर्णता बतलाने के लिए तत्त्वज्ञान सम्पूर्ण
द्वैतवासनाओ की ।निवृत्ति कर देता हैं, इसका समर्थन करते हैं और इसी समर्थन के लिए असत्य
अविद्यारूपता ही आखिर में बच जाने के कारण जगत् में न तो किसी तरह की हेदुता है और न
सत्ता ही है, यह बतलाते हैं ।
ये जो जगत् के नानाविध पदार्थ हैं वे किसी तरह के कारण के बिना ही उत्पन्न होते हैं और
चूँकि कारण के अभाव रहते भी उत्पन्न हैं, इसलिए उनका अस्तित्व है ही नहीं । ये सब अविद्यमान
ही विद्यमान की नाईं स्थित हैं