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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

रूपालोकमनस्कारै रन्ध्रैर्बहिरिव स्थितम् । सृष्टिं पश्यति जीवोऽन्तः सरसीमिव पर्वतः ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

अधःपतन हो ही जाता है । देखिये श्रुति क्या कहती है : कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः । एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ अहंकारात्मक जीव अपने भीतर स्थित जगत्‌ को बाहर देखता हैं, इसमें भी ष्टान्त देते हैं / जैसे हिमालय पर्वत अपने छिद्रों से निकले हुए जल को बाहर मानसरोवर आदि रूप में स्थित देखता है वैसे ही यह जीव भी अपने अन्तर्गत जगत्‌ को इन्द्रियों तथा मानसिक वृत्तियों से बाहर स्थित-सा देखता है