Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
जलस्यान्तर्जलांशानां द्वैताद्वैतमयो यथा ।
स्वसंविदात्मा सुस्पन्दस्तथा ब्रह्मणि भूतदृक् ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
वहाँ पर विदाभास का स्यन्दन हैं, इसमे भी द्रष्टान्त कहते हैं /
जैसे तालाब आदि के भीतर स्थित तरल जल तथा उसके अंशों का स्पन्दन द्वेताद्वैतमय है,
क्योकि तरलता के कारण भेद और अभेद का निर्वचन करना अत्यन्त कठिन है, वैसे ही ब्रह्म में
तत्-तत् जीवरूप आभास भी ब्रह्मसंविदात्मक ही है