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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 51

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, verse 51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 51

संस्कृत श्लोक

नीरसो भव भावेषु सर्वेषु विभवादिषु । पाषाणं हृदयं कृत्वा यथा भवसि भूतये ॥ ५१ ॥

हिन्दी अर्थ

दढ वैराग्य होना ही साधन- रहस्य है, यह कहते हैं / हे श्रीरामजी, समस्त सांसारिक विभव आदि भाव पदार्थो में विरक्त हो जाइये तथा पाषाण के समान अपने हृदय को बना करके एश्वर्य प्राप्ति के लिए आप जिसरूप से तैयार हो रहे हैं वैसा ही सन्नद्ध रहिये