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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 56

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, verse 56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 56

संस्कृत श्लोक

भावज्ञप्तिर्हि निर्मूला भावितापि न विद्यते । सलिलं मृगतृष्णेव न ददाति भवाङ्कुरम् ॥ ५६ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामजी, इस तरह के बोध से मूलअज्ञान का नाश होने पर अन्वेषण करने पर भी कहीं जगत्‌भ्रान्ति अस्तित्व नहीं रखती, ओर मृगतृष्णा जैसे जल प्रदान नहीं करती, वैसे ही यह संसार में अंकुर नहीं प्रदान करती