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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

परमात्मैव जीवोऽयं बुध्यमानस्त्वचेतनम् । आम्र एव रसापत्तेः प्रयाति सहकारताम् ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

उपयुक्त श्लोक के पूर्वार्ध का विवरण करते हैं / पूर्वोक्त रीति से अचेतन को यानी अहंकारादि शून्यरूपता को ही अपनी आत्मा में जान रहा यह जीव जागरूक होकर परमात्मरस के आवेश से परमात्मरूपता को ऐसे प्राप्त हो जाता है, जैसे कि हेमन्त ऋतु में एक तरह से सोया हुआ आम वसन्त ऋतु में रसावेश के कारण पल्लवित एवं पुष्पित होने के बाद प्रबुद्ध-सा होकर सहकारशब्दवाच्यता को प्राप्त होता है