Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 48
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
आसने शयने याने स्थितो यत्नेन बोध्यते ।
निद्रालुरिव निर्वाणमनोमनननिर्वृतः ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
षष्ठ आदि भूमिकाओं में प्रविष्ट होने
के कारण आसन, शयन या यान में स्थित, निर्वाणदशा को प्राप्त अतएव मानसिक चिन्ताओं से
सर्वथा अलग हुआ तत्त्वज्ञानी पुरुष निद्रालु की नाई, अनेक तरह के यत्नो से जगाने पर भी नहीं
जागता