Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
तज्ज्ञा व्यवहरन्तीह भाव्यभावनवर्जितम् ।
अरूपालोकमननं मौनं दारुनरा इव ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
तो क्या आप जैसे महानुभावों को भी वह वैसी ही सम्पादनीय हैं, इस पर नहीं यह कहते हैं /
ब्रह्मज्ञानी लोग इस संसार में बाह्य तथा मानसिक दृश्य-दर्शन के अभिमान से शून्य कर्मेन्द्रियों
के व्यापारों से रहित एवं भाव्य और भावन से वर्जित ऐसे व्यवहार करते है; जैसे काष्ठ के
पुरुष