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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 50

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, verse 50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 50

संस्कृत श्लोक

संविन्मात्रं विदुर्जन्तुं तस्य प्रसरणं जगत् । आत्मनिष्ठत्वमजगत्परमेत्युपदेशभूः ॥ ५० ॥

हिन्दी अर्थ

इस तरह व्यष्टि ओर समष्टि जीव-भावादि के वर्णन को परम ग्रस्तुत विषय में संयोजित करके अपने उपदेशरूप सर्वस्व को स्रक्षिप्त करते हुए महाराज वस्तिष्ठजी कहते हैं / हे श्रीरामचन्द्रजी, संविद्मात्र ही जीव कहा गया है और उसी के विस्तार को तत्त्वज्ञानी लोग "जगत्‌" समझते हैं यानी यह जो जगत्‌ है, वह एकमात्र संविद्रूप जीव का विस्तार ही है। जब यह जीव आत्मनिष्ठ हो जाता है तब अजगद्रूप अपने परम पद को प्राप्त हो जाता है, बस यही सर्वोत्कृष्ट उपदेशस्थिति है