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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 59

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, verse 59 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 59

संस्कृत श्लोक

चित्तोपशान्तौ संशान्ताः शान्ताये भोगबन्धवः । न स्वभावपरिक्षीणाश्चित्तमेषां किलाकरः ॥ ५९ ॥

हिन्दी अर्थ

मनयुक्त हठयोगी लोग शान्ति आदि गुणो के कारण अपनी आत्मा मे क्यो नहीं स्थित रहते ? इस आशंका पर कहते हैं । जो हठयोग से शान्त बने योगी लोग रहते हैं वे भी चित्त की उपशान्ति हो जाने पर ही भलीभाँति शान्त हो पाते हैं, अन्यथा नहीं क्योंकि उनकी भोगवासनाएँ बिलकुल मूल से छिन्न हुई नहीं रहतीं, इसमें कारण यह पड़ जाता है कि सम्पूर्ण वासनाओं का आधारभूत उनका चित्त तो बना ही रहता है