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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 51

पवासर्वँ सर्ग समाप्त इक्यावनवाँ सर्गं अज्ञानवश ही जीव, इन्द्रिय, मन, देह पुर्यष्टक आदि भ्रम उत्पन्न होते हैँ, तत्त्वज्ञान होने पर तो एकमात्र ब्रह्म ही रह जाता है -यह वर्णन ।

67 verse-groups

  1. Verse 1र्व मे असत्‌ अहंकार, देह, इन्द्रिय आदि की कल्पना, जैसे जीवसमष्टिरूप हिरण्यगर्भ की है, वैस…
  2. Verse 2इस प्रकार पुर्यष्टक की कल्पना के अनन्तर व्यवहार योग्य अर्थो की कल्पना भी जैसे समष्टि की ह…
  3. Verse 3गर्भावस्‍था से लेकर उसीका दिग्दर्शन कराते है । श्रीरामचन्द्रजी, जो व्यष्टि-जीव छठे महीने…
  4. Verse 4एवंच, हिरण्यगर्भं के मनोव्यापार में उसका निजी संवेदन (चैतन्य) जिस प्रकार इन्द्रिय ओर इन्द…
  5. Verse 5श्रीरामचन्द्र, व्यष्टि एवं समष्टि के रूप में आ रही संवित्‌ सृष्टि के पहले एकरूप ओर शुद्ध…
  6. Verse 6विषयों के दोषों से संवेदन का वह स्वरूप कलंकित क्यो नहीं होता ? इस शंका पर परमार्थतः वेद्य…
  7. Verse 7यदि शका हो कि धिति ही मन आविरूप हो जाती है“ ऐसा जब आप कह चुके हैँ तव मन आदि की असत्यता मे…
  8. Verse 8तब तत्त्वज्ञान से आविर्धुतस्वरूप होने से पहले संवेदनस्वरूप भी असत्‌ क्यो नहीं होता ? इस प…
  9. Verse 9यदि वह परमात्मा अद्वितीय ही है तो (तस्मात्‌ सर्व एव आत्मानो व्युवच्चरन्ति” (उसी परमात्मा…
  10. Verses 10–11अतएव आप अविद्यारूप रोग के मूल के विषय में चिन्तन न करे यानी उसकी जड़ खोजने में न लगे, कित…
  11. Verse 12श्रीरामजी, निष्पन्न होनेवाले व्यवहारो के लिए क्रियाश्रय होने के कारण व्यावहारिक सत्यभूत भ…
  12. Verse 13अव अविद्या का स्वरूप वतलाते है। श्रीरामचन्द्रजी, अतः भली प्रकार देखी जा रही भी अविद्या नह…
  13. Verse 14भद्र, (हम यह मानते हैं कि) मृगतृष्णा जल दिखाई दिया, पर उसे प्रयत्न से भी किन्हीं लोगों ने…
  14. Verse 15असत्‌ पदार्थ ही सत्‌ भासित होता है । उसकी सत्यता असद्रूप अविद्या से ही है । ज्ञान से तो ज…
  15. Verse 16श्रीरामजी, सत्य आत्मा के सन्निधान से अत्यन्त असद्रूप भी अविद्या की जीव, पुर्यष्टक आदिरूप…
  16. Verse 17श्रीरामभद्र, आप जैसे अधिकारी जीवों को उपदेश देने के लिए उस अविद्या की ही जीव आदिरूप कल्पन…
  17. Verse 18जीवरूपता को प्राप्त हुई-सी, पुर्यष्टकरूप पद में स्थित, अतएव मायारूपी कलंक से वेष्टित तथा…
  18. Verse 19रात्रि में बालक द्वारा कल्पित यक्ष की नाई, फिर वह सत्य हो या असत्य ही हो, यह जीवचिति “पंच…
  19. Verse 20ओर उस देहरूप आत्मा में उसी प्रकार उत्पन्न यानी उपर्युक्त दृष्टान्त की नाई उत्पन्न इन्द्रि…
  20. Verse 21इन्हीं पंचतन्मात्राओं से उत्पन्न बाहर-स्थित पंचमहाभूतों को, जो परमार्थतः उससे दूसरे नहीं…
  21. Verse 22तदनन्तर यह जीव, जिसे “ये इन्द्रिय, मन, प्राण आदि आन्तर पदार्थ हैं और ये घट आदि बाह्य पदार…
  22. Verse 23वहाँ विषय एवं इन्द्रिय के सन्निकर्षं से अभिव्यक्त स्वात्ससुख की ही विषयसुख के रूप से वह क…
  23. Verse 24उसी प्रकार वह स्वाभाविक आत्म-वेदन ही विषयसन्निकर्ष से अभिव्यक्त अहमाकार आत्मा का धर्म है,…
  24. Verse 25सांसारिक विषयभोगों में ही पुरुषार्थ की परिसमाप्ति है, यह मत बाँधकर नश्वर सुख को लक्ष्यकर…
  25. Verse 26श्रीरामजी, (उन दोनों प्रवृत्ति नियमों में एक तो स्वाभाविक राग आदि दोषों से जनित है और दूस…
  26. Verse 27उन दोनों स्थलों में भी स्वभाव या शास्त्र इन दोनों में से किसी एक का अनुसरण करनेवाले अज्ञ…
  27. Verse 28यद्यपि खोड ओर घट ये दोनों अपने प्राक्तन द्रव और पिण्डावस्था के विनाश से विकारस्वरूप हैं:…
  28. Verses 29–30अथवा खण्डो मधुरसेनेव” इस वाक्य में खण्डशब्द वनखण्ड का वाचक है और मधुरसेनेव” का अर्थ वसन्त…
  29. Verse 31जैसे मेघ कालभेद से - पहले ग्रीष्म-ऋतु में 'मैं सूर्यतापरूप हूँ” यों अभेदभावना कर सूर्यताप…
  30. Verse 32जगद्रूप विवर्त का नियम-क्रम यद्यपि कल्पित ही है; फिर भी कोई उसे अन्यथा नहीं कर सकता, यह क…
  31. Verses 33–34इसी प्रकार वस्तुस्वभाव का नियम भी वस्तुभेद से भिन्न ही है ओर न उसे कोई अन्यथा ही कर सकता…
  32. Verse 35ऐसा भले ही मान लिया जाय, परंतु उससे प्रकृत मे क्या आया ? इस पर कहते है । सर्ग के आदि में…
  33. Verse 36सत्य ओर अमृत के मिथुनीमाव से वाचारम्भण' श्रुति में दर्शित न्याय से दृष्टान्त बतलाते हैं ।…
  34. Verse 37इसीलिए उसके प्रथम कार्यभूत मन में चिद्रूपता तथा जडता-ये दोनो दिखाई पड़ती हैँ । उनमें जो न…
  35. Verse 38चेतन और जडस्वरूप (८) यह चित्त स्वयं जब भी जिस किसी पदार्थ (८) कहीं-कहीं “चित्तजाड्यात्मकम…
  36. Verse 39अतएव कालभेद से जीव मे अहमाकारभेद का अनुभव होता है, यह कहते हैं। चैतन्य से भीतर वासनारूपी…
  37. Verse 40जैसे स्वप्न में दिखाई पड़ा ग्राम वनादिसत्तारूपी भिन्नता के अवलोकन से वनादिभाव को प्राप्त…
  38. Verse 41जैसे स्वप्न में दिखाई दे रहा मनुष्य शीघ्र ही दीवार बनकर पट बन जाता है, वैसे ही मरण-मूर्च्…
  39. Verse 42यदि कोई यह शंका करे कि देह तो प्रत्यक्ष ही मरती और भस्मीभूत हो जाती है, भला वह फिर दूसरी…
  40. Verse 43तब क्या युवावस्था और वृद्धावस्था की नाई देहान्तर-प्राप्ति भी इस देह का कालिक परिणाम ही है…
  41. Verse 44यदि शंका हो कि जिन्हे पहले कभी देखा ही नहीं, उन देवादि शरीरो में इस जीव की वासना ही कैसी…
  42. Verse 45(&) उस स्रष्टा ईश्वर की पितृशरीर, मातृगर्भाशय और अपना शरीर ये तीन अवस्थाएँ एवं जाग्रत्‌,…
  43. Verse 46वही चिदात्मा जीव होकर आज अभिनव वर्तमान विषय को जिस प्रकार चित्स्वभाव होने से ही देखता है,…
  44. Verse 47इसीलिए अद्रष्ट विषय में भी भावनाओं के उपचय से दृढ़ हुई वासना पूर्वमे दष्ट विष्यो की वासना…
  45. Verse 48इस प्रकार अब तक जीव के वासनापरिणामस्वरूप देहादिवन्ध का वर्णन किया गया, अब उसकी शांति कब ह…
  46. Verse 49मोक्ष के बिना देहादि की निवृत्ति क्यो नहीं होती ? इस शंका पर कहते हैं। चूँकि जब तक मोक्ष…
  47. Verse 50अब, कर्थचित्‌ पांचभौतिक स्थूलशरीर की निवृत्ति होने पर भी मोक्ष के बिना लिगदेहात्मक पुर्यष…
  48. Verse 51यदि शका हो कि शास्त्रों में ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, प्राण, पचमहाभूत, अन्तःकरण, अविद्…
  49. Verses 52–53मुक्ति मे अनुपयोगी होने से भी इस मोक्षशास्त्र मे स्थूल पदार्थों के अस्तित्व की कल्पना युक…
  50. Verse 54श्रीरामजी, सबकी ही यह आतिवाहिक देह कभी तो सुषुप्तावस्था में स्थित रहती है और कभी स्वप्न क…
  51. Verse 55सुषुप्तावस्था में स्थित यह आतिवाहिक देह जब वासनारूप से भीतर प्रविष्ट हुए भविष्यत्‌ दुःस्व…
  52. Verse 56उन स्थावर आदि निकृष्ट योनियों में जड़ता के आधिक्य से सुषुप्ति की प्रचुरता है, यह कहते हैं…
  53. Verse 57इसलिए चित्त की अधिक जड़ता ही इस देह की सुषुप्ति है, चित्त का भ्रमण ही संसार है, चित्त का…
  54. Verse 58जीव की तत्त्वज्ञान से ही मुक्ति होती है ओर उसी तत्त्वज्ञान से वह वैसे परमात्मस्वरूपता को…
  55. Verse 59श्रीरामभद्र, (&) प्रस्तुत श्लोक में “च” शब्द अप्यर्थक है यानी उसका “भी” यह अर्थ है । एवंच…
  56. Verse 60जीवन्मुक्ति ही तुरीयावस्था हे । उसके परे तुरीयातीत ब्रह्मपद है । तत्त्वज्ञान होने से यह ज…
  57. Verse 61इस व्यवहार-भूमि में जो जीव "परमार्थतः मेरा यह परिमाण है और यह मेरा स्वरूप है" यों ज्ञान क…
  58. Verse 62तब क्या जीव के हृदय में वास्तविक भय है ? इस शंका पर नहीं” ऐसा कहते हैं। जीव के भीतर चितिक…
  59. Verse 63जीवरूप परमाणु के भीतर तो परम महत्‌ ब्रह्म के सिवा दूसरा कुछ भी नहीं है, अहो ! जहाँ-तहाँ य…
  60. Verse 64जिस प्रकार बटलोई के भीतर खोल रहे जल में नानात्व का भ्रम उत्पन्न होता है, उसी प्रकार जीवरू…
  61. Verse 65श्रीरामजी, वासनाओं का बन्ध ही इस जीवाणु का बन्ध है, वासनाओं का नाश ही इसका मोक्ष है और वा…
  62. Verse 66किस प्रकार स्फुरित होती है ? यह कहते हैं। जब यह जीव घनीभूत वासनाओं के मोह से युक्त होता ह…
  63. Verse 67वासनाओं के क्षयतारतम्य से वैचित्र्य की अभिव्यक्ति बतलाने के पश्चात्‌ ग्राह्य, ग्रहण आदि क…
  64. Verse 68उसीका स्पष्टीकरण करते है । अन्दर रहनेवाला जीव बाहर अनात्म पदार्थो पर जब आरूढ़ हो जाता है,…
  65. Verse 69इसी प्रकार हेय-उपादेय की विचित्रता भी वासनाध्यस्त ही है, वास्तविक नहीं, ऐसा कहते हैं। आत्…
  66. Verse 70ये तीनों जगत्‌ चैतन्यात्मा की एक चमत्कृति ही हे । इसलिए भेदक संकल्पो से प्रयोजन ही क्या र…
  67. Verse 71तत्त्वतः विचारा गया समुद्र जैसे तरंग आदि समस्त विभेदं से शून्य हुआ-आकाश से भी स्वच्छ-सम्प…