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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verses 33–34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, verses 33–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 33,34

संस्कृत श्लोक

आदर्शस्वच्छ आकाशे नैव स्वः प्रतिबिम्बति । व्यतिरेकासंभवतः कचत्येव हि केवलम् ॥ ३३ ॥ ब्रह्मणि त्वात्मनात्मैव स्थितः कचति बिम्बति । द्वैतीभवत्यदेहोऽपि चिन्मयत्वात्स्वभावतः ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार वस्तुस्वभाव का नियम भी वस्तुभेद से भिन्न ही है ओर न उसे कोई अन्यथा ही कर सकता है, इस आशय से आकाशादि के स्वभाव की और अज्ञात ब्रह्म के स्वभाव की परस्पर विलक्षणता बतलाते हैं। दर्पण की नाई स्वच्छ आकाश में अपना भाग (आकाश-भाग) या अपना कार्य प्रतिबिम्बित नहीं ही होता, क्योकि आकाश में या उसके कार्यभूत अन्य भूतों में आकाश का भेद नहीं रहता (भिन्न वस्तु में प्रतिबिम्ब पड़ता है-इस सिद्धान्त के अभिप्राय से यह कहा गया है), किंतु केवल आकाश प्रतिबिम्बशून्य दर्पण के मध्य के समान निर्मलरूप से शोभित होता है। (अविद्या से समन्वित ब्रह्म तो वैसा नहीं है, यह कहते हैं।) और अविद्या संवलित ब्रह्म में तो अपने स्वरूप से स्थित आत्मा ही समस्त वस्तुशक्ति आदि रूप से शोभित होता है, जीवरूप से प्रतिबिम्बित होता हे ओर चूँकि वह स्वभावतः चिन्मय है, इसलिए देहरहित होता हुआ भी वह भेदबुद्धि से द्रितीय-सा होता है