Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 55
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, verse 55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
यदा सुषुप्तभावस्थो भाविदुःस्वप्नवेधितः ।
तदा कालानलसमस्तिष्ठत्यनुदिताकृतिः ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
सुषुप्तावस्था में स्थित यह आतिवाहिक देह जब
वासनारूप से भीतर प्रविष्ट हुए भविष्यत् दुःस्वप्नो से विद्ध-सी होकर स्मृतिशून्य ओर अनुदित
आकारवाली हो जाती है, तब चिति के प्रतिबिम्ब से खचित होने से तथा अपने में सम्पूर्ण जगत् का
उपसंहार कर लेने से वह प्रलयकालीन अग्नि के समान प्रदीप्त होकर स्थित रहती हे