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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

न त्वेकत्वादनन्तत्वादवेद्यत्वादनामये । अभावत्वादनेकत्वादशून्यत्वात्परा स्थिता ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

विषयों के दोषों से संवेदन का वह स्वरूप कलंकित क्यो नहीं होता ? इस शंका पर परमार्थतः वेद्यपदार्थ का अस्तित्व ही न होने से वह कलंकित नहीं होता, यह कहते हैं। अद्वितीय, असीम ओर अवेद्य होने से निर्विकार इस चिति में दूसरे किसी पदार्थ का (अस्तित्व) है ही नहीं; क्योकि वे दूसरे पदार्थ देशकृत, कालकृत ओर वस्तुकृत परिच्छेदो एवं स्थूलता से युक्त है