Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 66
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, verse 66 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 66
संस्कृत श्लोक
वासनान्तोऽस्य सौषुप्ती स्वप्ने विस्फुरति स्थितिः ।
घनवासनमोहोऽयं जीवः स्थावरतादिभाक् ॥ ६६ ॥
हिन्दी अर्थ
किस प्रकार स्फुरित होती है ? यह कहते हैं।
जब यह जीव घनीभूत वासनाओं के मोह से युक्त होता है तब वह स्थावर आदि योनियं का भागी
होता है यानी स्थावर आदि योनियं मे प्राप्त-सा दिखलाई पडता है, जब मध्यम प्रकार की वासनाओं
से युक्त होता है तब पशु, पक्षी आदि योनियं का भागी होता हे ओर जब तनुवासनाओं (क्षीण वासना)
से समन्वित होता है तव मनुष्य, देव, गन्धर्व आदि योनियं मे प्राप्त होता हे । तात्पर्य यह है कि वासनाओं
के क्षय के तारतम्य से उत्तरोत्तर शुभयोनि की प्राप्ति होती है