Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाख्यं विद्धि संवेदनं स्वकम् ।
संपन्नं च यथा तत्ते प्रोक्तमाद्यमनःस्थितौ ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
एवंच, हिरण्यगर्भं
के मनोव्यापार में उसका निजी संवेदन (चैतन्य) जिस प्रकार इन्द्रिय ओर इन्द्रियो का विषयस्वरूप हो
जाता है, उसी प्रकार व्यष्टिजीवरूप आपका भी संवेदन हो जाता है, यही मने कहा - यह फलतः
निकलता है, यह आप जानिए