Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 64
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, verse 64 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 64
संस्कृत श्लोक
यत्र तत्र जगद्दृष्टमहो मायाविजृम्भितम् ।
स्थाल्यन्तः कथदम्बूनां यथा नाना भ्रमोदयः ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार बटलोई के भीतर खोल रहे जल में नानात्व का भ्रम उत्पन्न होता है, उसी प्रकार
जीवरूप परमाणु के भीतर मिथ्या ही संसार उत्पन्न होता है