Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
इति भाव्यमनेनेदमित्थं सर्वेश्वरे ततम् ।
क्रमं खण्डयितुं लोके कस्य नामास्ति शक्तता ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
जगद्रूप विवर्त का नियम-क्रम यद्यपि कल्पित ही है; फिर भी कोई उसे अन्यथा नहीं कर सकता,
यह कहते है ।
इस वस्तु से यह कार्य इस प्रकार होवे (जैसे अग्नि से उष्णता ओर जल से शीतलता), यों परब्रह्म
में कल्पित प्रसिद्ध क्रम को इस जगत् में ऐसा कौन जीव है, जो तोड़ सकता हो अर्थात् कोई तोड़ नहीं
सकता