Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verses 29–30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, verses 29–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 29,30
संस्कृत श्लोक
इतः पुष्पमितः पत्रमहमित्युदितो यथा ।
खण्डे स्वात्मनि नः सत्तारसोऽद्वित्वे द्वितां वहन् ॥ २९ ॥
इतः पट इतः कुड्यमहमित्यादितस्तथा ।
सर्वात्मनात्मनि ब्रह्म विद्धि त्वं द्वित्वमाहरत् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा खण्डो मधुरसेनेव” इस वाक्य में खण्डशब्द वनखण्ड का वाचक है और मधुरसेनेव” का
अर्थ वसन्तद्रव की नाई” ऐसा मानिए। एवंच वृक्ष विकार का हेतुभूत जलभाग, जो कि अविकारी रूप
ही है, दृष्टान्तरूप से कहा गया है, इस आशय से कहते हैं।
जैसे वृक्ष में प्रविष्ट जल, यहाँ मैं पत्र हूँ, यहाँ 'मैं फूल हूँ” इत्यादि विचित्ररूप से उदित होकर एक
होने पर भी अनेकता को धारण करता हुआ देखा गया है, वैसे ही हम लोगों की आत्मा में प्रसिद्ध
सत्तावाले ब्रह्म ने भी 'यहाँ मैं पट हूँ", “यहाँ मैं दीवार हूँ” इत्यादि भेदों से सम्पूर्ण जगदाकार से आत्मा में
द्वित्व को धारण कर लिया है, यह आप जानिए