Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 68
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, verse 68 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 68
संस्कृत श्लोक
जीवैक्यादुभयोः सत्ता ग्राह्यग्राहकयोस्तदा ।
आत्मानात्मसमालीढो बहिरन्तर्यदा चिता ॥ ६८ ॥
हिन्दी अर्थ
उसीका स्पष्टीकरण करते है ।
अन्दर रहनेवाला जीव बाहर अनात्म पदार्थो पर जब आरूढ़ हो जाता है, तब ग्राह्यग्राहकवासना,
मृगतृष्णा की नाई, अध्यस्त विभाग से प्रकट हो जाती है