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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

संनिवेशविकारादिदेशकालादिसंभवात् । संभवत्यत्र नत्वीशे देशकालाद्यसंभवात् ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

यद्यपि खोड ओर घट ये दोनों अपने प्राक्तन द्रव और पिण्डावस्था के विनाश से विकारस्वरूप हैं: तथापि उनके माधुर्य और मिड़ी के स्वरूप का विनाश नहीं होता, अतः उतने अंश में ही वे विवर्त के दृष्टान्त हैं। ब्रह्म में तो उनकी तरह (किसी अंश में भी) विकार का संभव नहीं है, क्योकि वह उनका विधर्मी है, यह कहते हैं। खोड, घट आदि में- देश, काल आदि से परिच्छिन्न होने के कारण अवयव विन्यास, विकार आदि हो सकते हैं; परंतु ब्रह्म में तो देशकृत, कालकृत आदि परिच्छेदों के न होने से वे विकार आदि नहीं हो सकते