Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
शुद्धा संवित्संभवन्ती संवेदनमनिन्दितम् ।
ततोऽहंवेदनानन्तजीवपुर्यष्टकान्विता ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्र, व्यष्टि एवं समष्टि के रूप में आ रही संवित् सृष्टि के
पहले एकरूप ओर शुद्ध ही थी । तदनन्तर सृष्टिकाल में वह संवित् भले ही अहमभिमानी असंख्य
जीवपुर्यष्टकों से समन्वित हो जाय; तथापि उसका संवेदनस्वरूप तो निष्कलंक ही रहता है