Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
आत्मनैवेदमखिलं संपन्नं द्वैतमद्वयम् ।
खण्डो मधुरसेनेव मृदेव च महाघटः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
उन दोनों स्थलों में भी स्वभाव या शास्त्र इन दोनों में से किसी एक का अनुसरण करनेवाले अज्ञ
आत्मा का ही तत्तत् व्यापारसाधनफ़लरूप से विवर्त होता है, यह कहते हैं।
श्रीरामभद्र, द्वैत एवं अद्वैत रूप यह सम्पूर्ण जगत् उस प्रकार आत्मा से ही बना है, जिस प्रकार ईख
के रस से खोड और मिट्टी से महाघट