Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verses 10–11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, verses 10–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 10,11

संस्कृत श्लोक

यतः कुतश्चित्संपन्ने त्वविद्यामय आमये । उपदेश्योपदेशेन प्रविलीने विचारणात् ॥ १० ॥ प्रशान्तसकलाकारं ज्ञानं तत्रावशिष्यते । यत्राकाशमपि स्थूलमणाविव महाचलः ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

अतएव आप अविद्यारूप रोग के मूल के विषय में चिन्तन न करे यानी उसकी जड़ खोजने में न लगे, कितु उसकी समुचित चिकित्सा का ही चिन्तन करें; क्योकि मूल की चिन्ता आदि चिकित्सा के वास्तव उपाय हैं ही नही, यह कहते है । विचार द्वारा उपदेश्य को उपदेश देने के अनन्तर हुए चरमप्रमाण मननात्मक विचार से जिस किसी अज्ञात मूल से उत्पन्न अविद्या रूप रोग के शांत हो जाने पर उस दशा में सम्पूर्ण आकारो से वर्जित ऐसा स्वरूपज्ञान अवशिष्ट रहता है, जहाँ पर परमाणु में सुमेरु पर्वत की नाई आकाश भी स्थूलरूप हो जाता है