Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
यद्यथैवात्मकचनं वेत्ति तं भवतात्मना ।
असत्यमपि तन्नेह व्यभिचारी कदाचन ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसा भले ही मान लिया जाय, परंतु उससे प्रकृत मे क्या आया ? इस पर कहते है ।
सर्ग के आदि में जिस वस्तुस्वभाव से आत्मा का प्रकाश हुआ, असत्य भी उस स्वभाव को सत्य
आत्मा द्वारा सत्यरूप से जानता है । ओर वह नियम कभी भी व्यभिचरित नहीं होता, अतः सभी प्रकार
के नियम सिद्ध हो जाते हैं, यह भाव हे