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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 67

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, verse 67 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 67

संस्कृत श्लोक

मध्यस्थवासनस्तिर्यक्पुरुषस्तनुवासनः । यदान्तर्जीवितेनान्तो बहिर्जाता घटादयः ॥ ६७ ॥

हिन्दी अर्थ

वासनाओं के क्षयतारतम्य से वैचित्र्य की अभिव्यक्ति बतलाने के पश्चात्‌ ग्राह्य, ग्रहण आदि के वैचित्र्य से भी वैचित्रयाभिव्यक्ति बतलाते हैं। सुषुप्ति की विच्युति के समय जब देह के भीतर नख के अग्रभाग से लेकर व्याप्त प्राणो मेँ अहम्भाव से "देहपरिमाणवाला ही में हू यों जब परिच्छेद होता है तब घट आदि पदार्थ बाहर उत्पन्न हो जाते है । (वे बाहर होवे, उससे क्या ? इस पर कहते हैं।) वैसी स्थिति में चक्षु आदि द्वारो से निकले हुए अन्तःकरण द्वारा बाहर निकला हुआ अन्तःकरणवृत्तिअवच्छिन्न चैतन्यात्मा जीव बाह्य घटादि विषयों के साथ व्याप्ति करता हे । पश्चात्‌ “मै घट को जानता हू यों ग्राह्य एवं ग्राहक की वासनात्मिका सत्ता तत्तत्‌ वैचित्र्य से स्पष्टतः अभिव्यक्त हो जाती हे