Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
एभ्य एव समुत्पन्नं बहिःस्थं भूतपञ्चकम् ।
पश्यत्यनन्यदन्याभं शाखाशतमिवाङकुरः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
इन्हीं पंचतन्मात्राओं से उत्पन्न बाहर-स्थित पंचमहाभूतों
को, जो परमार्थतः उससे दूसरे नहीं हे यानी चितिरूप ही हैं, इन्द्रियरूप द्वारो से उस प्रकार वह अन्य-
सा देखती है, जिस प्रकार सैकड़ों शाखाओं को अंकुर