Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 57
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, verse 57 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
सुषुप्ततास्य जडता स्वप्नोत्थेयं हि संसृतिः ।
यः प्रबोधोऽस्य सा मुक्तिस्तज्जाग्रद्या तु तुर्यता ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए चित्त की अधिक जड़ता ही इस देह की सुषुप्ति है, चित्त का भ्रमण ही संसार है, चित्त का
तत्त्वज्ञान ही वन्ध से मुक्ति है, तुर्यता ही इसकी जाग्रदवस्था है, यही सिद्ध हआ, यह कहते हैँ ।
श्रीरामभद्र, इस देह की सुषुप्तावस्था में स्थिति जडता हे, स्वप्नावस्था से ही उत्पन्न यह संसार
है, इसका जो तत्त्वज्ञान है, वह मुक्ति है और जो जाग्रदवस्था है, वही तुर्यरूपता है