Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
असत्यमेव म्रियते त्वसत्यं जायते पुनः ।
जीवः स्वप्रतिभासेन स्वप्नवत्स्वान्यरूपवत् ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई यह शंका करे कि देह तो प्रत्यक्ष ही मरती और भस्मीभूत हो जाती है, भला वह फिर
दूसरी देह कैसे बन जायेगी ? तो इस पर कहते है।
स्वप्न में अपने प्रतिभास से अपनी दूसरी देह की तरह यह जीव असत्य ही मरता है और फिर
असत्य ही उत्पन्न होता हे । तात्पर्य यह हे कि मरनेवाले का मरण और जन्म भी प्रातिभासिक ही है। जी
रहे लोगों को तो अपनी अविद्या से कल्पित ही उसकी देह के दाह आदि का दर्शन होता है कि उसकी
वासनामय देह का