Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 44
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
वस्तु दृष्टमदृष्टं च स्वप्ने समनुभूयते ।
जीवस्वप्ने जगद्रूपं विद्धि वेद्यविदां वर ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि शंका हो कि जिन्हे पहले कभी देखा ही नहीं, उन देवादि शरीरो में इस जीव की वासना ही
कैसी 2 तो इस पर कहते है।
हे तत्त्वज्ञो मे श्रेष्ठ श्रीरामभद्र, (“तस्य त्रय आवसथास्त्रयः स्वप्नाः" (4) इस श्रुति के अनुसार) यह
जगद्रूप तो जीवस्वप्न के अन्तर्गत ही है यानी जीव का एक स्वप्न ही है, यह आप जानिए । ओर चूँकि
स्वप्न में इस जन्म में दुष्ट एवं अदृष्ट वस्तुओं का अनुभव होता है, (इसलिए पूर्व में अदृष्ट देवादि शरीरो
की वासना होने मेँ किसी प्रकार की आपत्ति नहीं हे ।) (07)