Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
अजाग्रत्दृष्टिदृष्टो यः स्वाभिधानादिनेरितः ।
न स्वप्नो विद्यते तस्मादच्छात्मा चितिमात्रकम् ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
(&) उस स्रष्टा ईश्वर की पितृशरीर, मातृगर्भाशय और अपना शरीर ये तीन अवस्थाएँ एवं
जाग्रत्, स्वप्न तथा सुषुप्ति नामक तीन स्वप्न हैं ।)
(०9) वस्तुतः अनादि संसार में अननुभूत कुछ भी नहीं है, अतः मरणकाल में भावि देह के
आरम्भक कर्मो से उद्बुद्ध हुई वासना के अनुसार देहान्तर की उत्पत्ति हो सकती है ।
तब महावाक्यो से जनित ब्रह्मसाक्षात्कार से प्राप्य ब्रह्मभाव भी देहान्तर की नाई वासनामय स्वप्न
ही क्यो नहीं है ? इस पर कहते है ।
जो "शिवमद्वैतं चतुर्थ मन्यन्ते" इस श्रुति में उक्त शिवादि स्वनाम आदि से कथित है ओर तुरीय
दृष्टि से दृष्ट है, उस परमात्मा को उक्त तीनों लक्षणोंवाला स्वप्न ही नहीं हो सकता । जाग्रत् काल में
कभी भी उसका अनुभव न होने से उसकी वासना ही अप्रसिद्ध है, अतः वह वासनामय नहीं हो सकता ।
इसलिए यह निर्मलात्मा एकमात्र चिति ही है