Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 25
73 verse-groups
- Verse 1वर्णन किये जानेवाले प्रकार के विषय में प्रश्न का अवसर दे रहे भुशुण्डजी वणित प्राणविज्ञान…
- Verse 2भुशुण्ड ने कहा : हे मुने, सब कुछ जानते हुए भी आप मुझसे लीलावश पूछते हैं, यह मैं अनुमान कर…
- Verse 3हे ब्रह्मन्, इस प्राण में स्पन्दन शक्ति तथा निरन्तर गतिक्रिया रहती है । इस प्रकार स्पन्द…
- Verse 4हे ब्रह्मन्, इस अपानवायु में भी निरन्तर स्पन्दशक्ति तथा सतत गति रहती है । यह अपानवायु भी…
- Verse 5कल्याण के लिए उत्तम साधनभूत प्राणायाम अयत्नतः प्रवृत्त होता रहता है, अतः उसे आप सुनिए
- Verse 6उसमें हृदय प्रदेश से लेकर मूधापिर्यन्त (मस्तक तक) की आधी प्रश्वासगति मे आन्तररेवकरूपता की…
- Verse 7बारह अंगुलपर्यन्त बाह्य प्रदेश की ओर नीचे जा रहे प्राणों का (प्राणवृत्तियों का) जो शरीर क…
- Verse 8ब्रह्मन्, बाह्य-प्रदेश से शरीर के भीतर की ओर अपान के प्रवेश करनेपर यत्न के बिना शरीर की…
- Verse 9अब कल्पित एवं अकल्पित दोनों तरह से अन्तःकुम्भक प्राणायाम का लक्षण कहते हैं। महाराज, अपान…
- Verse 10बाहर भी रेचक आदि प्राणायामो का दिग्दर्शन कराने के लिए उपक्रम करते है। नासिका के अग्रभाग स…
- Verse 11महामुने, जाग्रत आदि सभी समयो में स्थित रहनेवाले तथा किसी प्रकार के यत्न के बिना स्वतः होन…
- Verse 12हे प्रभो, नासिका के अग्रभाग से बाहर के प्रदेश में बारह अंगुल तक अभ्युदित हुआ (अभिमुख होकर…
- Verse 13बाह्य वायु के अन्दर अपान वायु के एकीभाव से हुई निश्वल-प्राय स्थिति की कुम्भकरूप से कल्पना…
- Verse 14हृदय-ग्रदेश से लेकर नासिका के अग्रभाग तक जो उसकी पूर्वप्राणस्वरूप से गति है, उसकी बाह्यपू…
- Verse 15उससे बाहर हुई वायुगति की दूसरे बाह्यपूरकरूप से कल्पना करते हैं। नासिका के अग्रभाग से भी न…
- Verse 16बाहर प्राण-वायु के होने पर जब तक अपान- वायु का उद्गम नहीं होता, तब तक एकरूप से अवस्थित पू…
- Verse 17अब बाहर के दो प्रकार के रेचक प्राणायामों की कल्पना का प्रकार बतलाते हैं। ब्रह्मन्, अपान-…
- Verse 18बाहर के बारह अंगुल के अन्तिम भाग से नासिका के अग्रभागतक अपानवायु की संचार द्वारा स्वरूपाभ…
- Verse 19मुनिवर, प्राण और अपानवायु के स्वभावभूत ये जो बाह्य और आभ्यन्तर कुम्भक आदि प्राणायाम हैं,…
- Verse 20हे महाबुद्धे, ये देहवायु के स्वभावभूत बाह्य एवं आन्तर रेचक आदि के भेद से आठ प्रकार के प्र…
- Verse 21इन प्राणायामों के अभ्यास से समय आने पर प्राणादि वायुओं का निरोध हो जाता है, ऐसा कहते हैं।…
- Verse 22कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि का अभिमान भी इससे नष्ट हो जाता है, यों कहते हैं। मनुष्य अपने भीतर…
- Verse 23प्राणायाम के अभ्यास से बाह्यद्ष्टि का परित्याग, तदनन्तर अन्तरात्मा के साक्षात्कार की उत्प…
- Verse 24इस प्रकार प्राणायाम का अभ्यास कर रहे पुरुष का मन विषयाकार वृत्तियों के होने पर भी बाह्य व…
- Verse 25महाराज, इस प्राण-दुष्टि का अवलम्बन कर जो कृतबुद्धि महात्मा स्थित हैं, उन्होंने समस्त प्रा…
- Verse 26महाराज, बैठते, चलते, सोते ओर जागते-सदा-सर्वदा पुरुष यदि इसी दृष्टि की उपासना करें, तो वे…
- Verse 27प्राण ओर अपान की उपासना द्वारा प्राप्त हुए तत्त्वज्ञान से सम्पन्न पुरुषों कामन, जो मलरूप…
- Verse 28समस्त कर्मो का निरन्तर अनुष्ठान कर रहा स्वच्छ -चित्त विज्ञ पुरुष प्राण अपान गति को प्राप्…
- Verse 29हे ब्रह्मन्, हृदय प्रदेश में स्थित पद्मपत्र से प्राण का अभ्युदय होता है ओर बाहर बारह अंग…
- Verse 30हे महामुने, बाह्य बारह अंगुल की चरम सीमा से अपान का उदय होता है और हृदय प्रदेश में संस्थि…
- Verses 31–32मुनीन्द्र, जिस बारह अंगुल की चरम सीमा के आकाश-प्रदेश में प्राण की समाप्ति हो जाती है उसी…
- Verse 33प्राण एवं अपान मे अग्नि ओर सोमरूपता जो पहले कही ग़ थी, उसका उष्णत्व, शीतत्व, ऊर्ध्वमुखत्व…
- Verse 34प्राण ओर अपान में सूर्य और चन््ररूपता की भी भावना करनी चाहिए, इसका भी उपपादन करते हैं । प…
- Verse 35अपान-वायुरूप यह चन्द्रमा पहले मुख के अग्रभाग को पुष्टकर उसके क्षणभर ही पीछे हृदयाकाश का (…
- Verse 36अपानरूप चन्द्रमा के भीतर की एक कला का प्राणरूपी सूर्य के साथ जिस ब्रह्मरूप प्रदेश में सम्…
- Verse 37प्राणरूपी सूर्य के भीतरी एक कला का अपानरूपी चन्द्रमा के साथ जिस पद में सम्बन्ध होता है, उ…
- Verse 38एक ही वायु में क्रमश: उक्त दोनों प्रकार की शक्तियाँ उत्पन्न होती हैं, ऐसी भावना करनी चाहि…
- Verse 39एकमात्र प्राण-वायु ही शरीर को आनन्द पहुँचानेवाली चन्द्ररूपता का परित्याग कर क्षणभर में शो…
- Verse 40बाह्य-प्रदेश में बारह अंगुलपर्यन्त प्रसृत प्राण-वायु जब तक उष्णता का परित्याग कर शीतलता प…
- Verse 41उसी प्रकार अन्तःकुम्भक में भी हृदयगत प्राण ओर अपान की सन्धि में प्रतिष्ठित हुए मन में अपन…
- Verses 42–43अथवा हृदयस्थ अपनी आत्मा ही प्राणात्मक सूर्य है, वही अपानात्मक बन्द्ररूप होकर उदय, अस्तमय…
- Verse 44यदि शंका हो कि हृदय में आत्म-साक्षात्कार से क्या फल ? बाह्य अन्धकार से बाहर ही अपरिच्छिन्…
- Verse 45ब्रह्मन्, प्रयत्नपूर्वक प्राणरूपी सूर्य का अवलोकन करना चाहिए, यही हृदयगत अज्ञानान्धकार क…
- Verse 46रुचि के उत्पादन द्वारा अधिकारियों की प्रवृत्ति कराने के लिए उक्त बाह्य ओर आन्तर कुम्भकनिष…
- Verse 47अपान-वायु का अस्त हो जाने पर हृदय-कमल से प्राण का वहाँ उस प्रकार शीघ्र उदय हो जाता है, जि…
- Verse 48चारों ओर से सूर्य के प्रकाश के नष्ट हो जाने पर जिस प्रकार उसके पीछे क्षणभर में ही छायारूप…
- Verse 49हे सन्मते, जिस भूमि में प्राण की उत्पत्ति होती है, उस भूमि मे अपान का विनाश हो जाता है ओर…
- Verse 50प्राण-वायु के अस्त हो जाने पर और अपान-वायु के उदयोन्मुख होने पर बाह्य कुम्भक का चिरकाल तक…
- Verse 51अपान-वायु के अस्त होने पर ओर प्राण-वायु के तनिक उदयोन्मुख होने पर भीतरी कुम्भक का चिरकाल…
- Verse 52ब्रह्मन्, जिस स्थान में अपान-वायु का उदय होता है, उस द्वादश अंगुलपरिमित स्थान से दूर कोट…
- Verse 53नासिका-छिद्र से अपान-वायु का भीतर प्रवेश होने पर बाह्य रेचक के आधारभूत, प्राण के पूरण के…
- Verse 54जिस हृदयवर्तीं ब्रह्मरूप स्थान में ये प्राण ओर अपान दोनों विलीन हो जाते हैं, उस शान्त, आत…
- Verse 55अब अर्कतां संपरित्यज्य न यावच्चन्द्रतां गतः“ इससे उत्तरार्धे अदेशकाले न शोच्यते"यह जो कहा…
- Verse 56प्राण-वायु के अपानभक्षणोन्मुख होने पर बाहर और भीतर पूर्वोक्त चैतन्य में देश, काल एवं तदनन…
- Verse 57जिस परब्रह्मरूप चैतन्य मे अपान के साथ प्राण का, प्राण के साथ अपान का तथा उन दोनों के साथ…
- Verse 58प्राण और अपान के सन्धिकाल मे सभी प्राणियों को उक्त अवस्था रहती है, परन्तु उसका अनुभव केवल…
- Verse 59किसी प्रकार के यत्न के बिना ही सिद्ध हुआ अन्तःस्थ कुम्भक सर्वातिशायी ब्रह्मरूप परम पद है
- Verse 60यही आत्मा का असली स्वरूप है ओर यही अशेष मलों से निर्मुक्त सूर्य, चन्द्र आदि प्रकाशमान पदा…
- Verse 61उस प्रकार तत्-तत् भिन्न-भिन्न क्रियाओं के भेद से भिन्न-भिन्न हुए प्राणोपासना के प्रकार…
- Verse 62जिस प्रकार जल के अन्दर माधुर्य रहता है, उसी प्रकार अपान के अन्दर रहनेवाले चिदात्मा की, जो…
- Verse 63जो प्राणविलय का और जो अपानविनाश का समीप एवं अन्त में रहकर प्रकाशक है तथा जो प्राण ओर अपान…
- Verse 64ब्रह्मन्, प्राण के प्राणनव्यापार में सबसे बढ़ चढ़कर जो निमित्तभूत है, जीव के जीवनादि व्य…
- Verse 65महाराज, जो मन के मनन आदि व्यापार में हेतुभूत है, जो बुद्धि के बोधनव्यापार में निमित्तभूत…
- Verse 66जिसमें यह समस्त पुरोवर्ती पदार्थ विद्यमान हैं, जिससे समस्त जगत उत्पन्न हुआ है, जो सर्वात्…
- Verse 67ब्रह्मन्, जो सूर्य आदि समस्त अवभासक पदार्थो का भी अवभासक है, जो समस्त पावन पदार्थो में प…
- Verse 68जिसमें अपानवायु अस्त हो जाता है और जिसमें तनिक भी प्राण का अभ्युदय नहीं होता, उस समस्त कल…
- Verse 69अव बाह्य ओर आन्तर प्रदेशरूप उपाधिभेद का परित्याग कर यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति…
- Verse 70बाह्य ओर आभ्यन्तर प्रदेश मेँ स्थित, योगियों द्वारा अनुभूत होनेवाले जो दो प्राण ओर अपान की…
- Verse 71के ऊपर आरूढ होकर परिच्छिन्न होता हुआ प्राण ओर अपान की शक्तिस्वरूप हो जाता है एवं अन्यान्य…
- Verse 72प्राण, अपान एवं कुम्भकरूप से तथा उनके विसर्ग रेवक आदि रूप से चित्तत्व ही विवर्तित होता है…
- Verse 73जो प्राण ओर अपान के चैतन्य में हेतुभूत हैं, जो उनके अस्तित्व का ज्ञान करानेवाले है, जो स्…
- Verse 74ब्रह्मन्, जो प्राण वायु के स्पन्दन में हेतुभूत है, जो इन्द्रियों के होनेवाले विषयप्रदेश-…
- Verse 75जो परमार्थ दृष्टि से समस्त कलनारूपी कलंकों से विनिर्मुक्त है, जो आपातदर्शी पुरुषों की दृष…