Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
व्योम्नि नित्यमपानस्य तं विदुः कुम्भकं बुधाः ।
बाह्योन्मुखस्य वायोर्या नासिकाग्रावधिर्गतिः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
हृदय-ग्रदेश से लेकर नासिका के अग्रभाग तक जो उसकी पूर्वप्राणस्वरूप से गति है, उसकी
बाह्यपूरकरूप से भी कल्पना करनी चाहिए, ऐसा कहते हैँ ।
महाराज, बाह्योन्मुख वायु की जो नासिकाग्रपर्यन्त गति है, वह पहला बाह्यपूरक है, यों योगशास्त्र
के ज्ञाता लोग कहते हैं