Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 38

संस्कृत श्लोक

ग्रस्ता तत्पदमासाद्य न भूयो जन्मभाङ्नरः । प्राण एवार्कतां याति सबाह्याभ्यन्तरेऽम्बरे ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

एक ही वायु में क्रमश: उक्त दोनों प्रकार की शक्तियाँ उत्पन्न होती हैं, ऐसी भावना करनी चाहिए, यह कहते हैं। एकमात्र प्राण-वायु ही बाहर एवं भीतर से युक्त आकाश में पहले सूर्यरूपता को प्राप्त करता है ओर तदनन्तर आनन्दकारिणी चन्द्ररूपता को प्राप्त करता है