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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 52

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 52

संस्कृत श्लोक

अन्तःकुम्भकमालम्ब्य चिरं भूयो न शोच्यते । प्राणरेचकमालम्ब्य अपानाद्दूरकोटिगम् ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मन्‌, जिस स्थान में अपान-वायु का उदय होता है, उस द्वादश अंगुलपरिमित स्थान से दूर कोटिगत यानी सोलह अंगुलपरिमित भाग में प्रसरणशील प्राण-रेचक का अवलम्बन कर स्वच्छ (निःशेष वायु के रेचन से निर्मल) कुम्भक का अभ्यास करने से पुनः योगी संसाररूप ताप से तप्त नहीं होता