Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
बाह्योन्मुखत्वं प्राणानां यद्धृदम्बुजकोटरात् ।
स्वरसेनास्तयत्नानां तं धीरा रेचकं विदुः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
उसमें हृदय प्रदेश से लेकर मूधापिर्यन्त (मस्तक तक) की आधी प्रश्वासगति मे आन्तररेवकरूपता
की भावना करनी चाहिए और मूर्धा से लेकर बाहर बारह अगल पर्यन्त की आधी प्रश्वासगति में
बाह्यपूरकरूपता की भावना करनी चाहिए, ऐसा कहते है ।
मुनिवर, किसी प्रकार के यत्न के बिना प्राणों की हृदयकमल के कोश से होनेवाली जो स्वभावतः
बहिर्मुखता है, विद्वान लोग उसे रेचक कहते हैं