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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 40

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 40

संस्कृत श्लोक

क्षणादायाति सूर्यत्वं संशोषणकरं पदम् । अर्कतां संपरित्यज्य न यावच्चन्द्रतां गतः ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

बाह्य-प्रदेश में बारह अंगुलपर्यन्त प्रसृत प्राण-वायु जब तक उष्णता का परित्याग कर शीतलता प्राप्त नहीं करता, तब तक वह प्राण ओर अपान की सन्धि-अवस्था रहती है । उस अवस्था में देह के बाहर प्राण का विलय हो जाने से निर्देहत्व, निष्क्रियत्व, निर्मनरत्व आदि आत्मा के वास्तव स्वभावो की संभावना हो सकती हे, अतः उनका वहाँ पर योगी लोग विचार करते हैं। बाह्य कुम्भक में देहादि देश का परिच्छेद एवं चन्द्र-सूर्यात्मक प्राण-अपान-क्रियाप्रयुक्त आयुरूप काल का परिच्छेद न होने के कारण देश-काल-शून्य (स्वात्मस्वरूप) पद में प्रतिष्ठित हुआ योगी कभी शोक नहीं करता