Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 72
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, verse 72 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 72
संस्कृत श्लोक
हृत्प्राणकुम्भकं देवं बहिश्चापानकुम्भकम् ।
पूरकांशविसृष्टं यत्तच्चित्तत्त्वमुपास्महे ॥ ७२ ॥
हिन्दी अर्थ
प्राण, अपान एवं कुम्भकरूप से तथा उनके विसर्ग रेवक आदि रूप से चित्तत्व ही विवर्तित होता
है । इसलिए एकमात्र चित्तत्व की उपासना करनी चाहिए, यों कहते हैं।
महाराज, जो हृदयगत प्राण की कुम्भकावस्था का स्वरूपभूत है, जो बाहर अपान की
कुम्भकावस्था का स्वरूपभूत है और जो पूरकांश से विसृष्ट है, उस प्रकाशमान चित्तत्त्व की हम
उपासना करते हैं