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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

तावत्पूर्णं समावस्थं बहिष्ठं कुम्भकं विदुः । यत्तदन्तर्मुखत्वं स्यादपानस्योदयं विना ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

अब बाहर के दो प्रकार के रेचक प्राणायामों की कल्पना का प्रकार बतलाते हैं। ब्रह्मन्‌, अपान-वायु के उदय के (प्रस्पन्द के) बिना जो वायु की अन्तर्मुखता (प्रस्पन्दोन्मुखता) रहती है, वह बाह्य रेचक है, यह जानना चाहिए । उपासित हुआ वह उपासक को मुक्ति प्रदान करता है