Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
स्वभावा देहवायूनां कथिता मुक्तिदा मया ।
गच्छतस्तिष्ठतो वापि जाग्रतः स्वपतोऽपि वा ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
इन प्राणायामों के अभ्यास से समय आने पर प्राणादि वायुओं का निरोध हो जाता है, ऐसा
कहते हैं।
जाते या बैठते, जागते या सोते सभी अवस्थाओं में अभ्यास करने पर स्वभावतः अतिचपल ये वायु
समय आने पर निरुद्ध भी हो जाते हैं