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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

हृदाकाशोन्मुखोऽपानो निम्ने वहति वारिवत् । अपानश्चन्द्रमा देहमाप्याययति बाह्यतः ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

प्राण एवं अपान मे अग्नि ओर सोमरूपता जो पहले कही ग़ थी, उसका उष्णत्व, शीतत्व, ऊर्ध्वमुखत्व एवं अधोमुखत्व के प्रदर्शन द्वारा उपपादन करते है । महाराज, यह प्राण-वायु अग्निशिखा के सदृश बाह्य आकाशोन्मुख होकर बहता है ओर अपान- वायु जल के सदृश हृदयाकाशोन्मुख होकर निम्न भाग में बहता हे ॥३ २॥ ब्रह्मन्‌, चन्द्रमारूप अपान- वायु शरीर को बाहर से पुष्ट करता है और सूर्यरूप या अग्निरूप प्राण-वायु इस शरीर को भीतर से परिपक्व कर देता हे