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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 55

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, verse 55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 55

संस्कृत श्लोक

तदालम्ब्य पदं शान्तमात्मानं नानुतप्यते । प्राणभक्षोन्मुखेऽपाने देशं कालं च निष्कलम् ॥ ५५ ॥

हिन्दी अर्थ

अब अर्कतां संपरित्यज्य न यावच्चन्द्रतां गतः“ इससे उत्तरार्धे अदेशकाले न शोच्यते"यह जो कहा गया है, उसका विवरण करते हुए बाह्य कुम्भक में कहे गये देश-काल-बाध का अन्त:कुम्भक में भी अनुकर्ष बतलाते हैं। अपान-वायु के प्राणभक्षणोन्मुख होने पर बाहर यानी प्राणलय के अधिष्ठानभूत चैतन्य में और भीतर यानी प्राणनिर्गम के अपादानभूत चैतन्य में बाध द्वारा देश, काल और उनमें रहनेवाले समस्त पदार्थ निरवयव चैतन्यात्म ब्रह्मस्वरूप ही हैं, ऐसा विचार करने से मनुष्य फिर शोक का भागी नहीं होता