Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verses 31–32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, verses 31–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
अस्तंगतिरथाम्भोजमध्ये हृदयसंस्थिते ।
प्राणो यत्र समायाति द्वादशान्ते नभःपदे ॥ ३१ ॥
पदात्तस्मादपानोऽयं खादेति समनन्तरम् ।
बाह्याकाशोन्मुखः प्राणो वहत्यग्निशिखा यथा ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
मुनीन्द्र, जिस बारह अंगुल
की चरम सीमा के आकाश-प्रदेश में प्राण की समाप्ति हो जाती है उसी आकाश-प्रदेश से यह
अपान उसीके बाद उत्पन्न हो जाता है