Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
प्राणः सूर्योऽग्निरथवा पचत्यन्तरिदं वपुः ।
प्राणो हि हृदयाकाशं तापयित्वा प्रतिक्षणम् ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
प्राण ओर अपान में सूर्य और चन््ररूपता की भी भावना करनी चाहिए, इसका भी उपपादन
करते हैं ।
प्राण-वायु प्रतिक्षण हृदयाकाश को संतप्त कर पश्चात मुखाग्रभाग के आकाश को तपाता है,
क्योकि यह उत्तम सूर्य ही है