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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

हृदन्तरस्थानिष्पन्नघटवद्या स्थितिर्बहिः । द्वादशाङ्गुलपर्यन्ते नासाग्रसमसंमुखे ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

बाह्य वायु के अन्दर अपान वायु के एकीभाव से हुई निश्वल-प्राय स्थिति की कुम्भकरूप से कल्पना करते हैँ । ब्रह्मन्‌, मृत्तिका के अन्दर असिद्ध घट की स्थिति के सदृश नासिका के अग्रभाग से लेकर बराबर सामने बारह अंगुलपर्यन्त आकाश में जो अपानवायु की निरन्तर स्थिति है, उसे पण्डित लोग कुम्भक कहते हैं