Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verses 42–43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, verses 42–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
आन्मनो निजमाधारं न भूयो जायते मनः ।
सोदयास्तमयं सेन्दुं सरश्मिं सगमागमम् ॥ ४२ ॥
हृदये भास्करं देवं यः पश्यति स पश्यति ।
न क्षीणं नापरिक्षीणं बहिष्ठं सिद्धये तमः ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा हृदयस्थ अपनी आत्मा ही प्राणात्मक सूर्य है, वही अपानात्मक बन्द्ररूप होकर उदय,
अस्तमय और उनकी रश्मिभूत व्यानादि वृत्ति-विशेषों से विवृत होता है, इसलिए उसके अतिरिक्त
और कुछ नहीं है, इस प्रकार की उपासना ही आत्म- साक्षात्कार में कारण है, ऐसा कहते हैं।
उदय, अस्त, चन्द्रमा, रश्मियाँ, गमागम इन सबसे युक्त हृदयकाश में स्थित प्राणरूप सूर्यदेव का
जो कोई तात्त्विकरूप से दर्शन करता है, वही असली तत्त्व को जानता है