Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 46

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 46

संस्कृत श्लोक

सोदयास्तमयं यत्नात्प्राणार्कमवलोकयेत् । अपानेन्दुः प्रयात्यस्तं यत्र हृत्पद्मकोटरे ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

रुचि के उत्पादन द्वारा अधिकारियों की प्रवृत्ति कराने के लिए उक्त बाह्य ओर आन्तर कुम्भकनिष्ठा का वर्णन कर रहे पक्षिराज भुशुण्डजी भूमिका बधते हैं । ब्रह्मन्‌, जिस हृदय-कमलरूपी कोटर में अपान-वायुरूप चन्द्रमा अस्त हो जाता है, उस हृदय- कमलरूप कोटर से बाह्योन्मुख प्राणरूपी सूर्य का अपने भीतर उदय होता है