Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 75
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, verse 75 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 75
संस्कृत श्लोक
यदखिलकलनाकलङ्कहीनं परिवलितं च सदा कलागणेन ।
स्वनुभवविभवं पदं तदग्र्यं सकलसुरप्रणतं परं प्रपद्ये ॥ ७५ ॥
हिन्दी अर्थ
जो परमार्थ दृष्टि से समस्त कलनारूपी कलंकों से
विनिर्मुक्त है, जो आपातदर्शी पुरुषों की दृष्टि से जीवोपाधिभूतप्राण आदि सोलह कलाओं से सदा
परिवेष्टित है, जो प्रमात्मक अनुभवरूपी एश्वर्य से परिपूर्ण है तथा जो समस्त देवताओं से वन्दित
है, उस सर्वश्रेष्ठ परमात्मरूप परमपद की हम उपासना करते हैं