Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
द्वादशाङ्गुलपर्यन्ताद्बाह्यादभ्युदितः प्रभो ।
यो वातस्तस्य तत्रैव स्वभावात्पूरकादयः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
हे प्रभो, नासिका के अग्रभाग से बाहर
के प्रदेश में बारह अंगुल तक अभ्युदित हुआ (अभिमुख होकर स्थित हुआ) जो वायु है, उन्हीं बाह्य
प्रदेशों में उस वायु की बाह्यपूरक आदि के रूप में स्वभावतः भावना करनी चाहिए