Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 64
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, verse 64 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 64
संस्कृत श्लोक
प्राणस्य प्राणनं प्रोच्चैः परं जीवस्य जीवनम् ।
देहस्य धारणं धुर्यं चिदात्मानमुपास्महे ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्मन्, प्राण के प्राणनव्यापार
में सबसे बढ़ चढ़कर जो निमित्तभूत है, जीव के जीवनादि व्यापार में जो सबसे बढ़चढ़कर निमित्तभूत
है, देह के धारण आदि व्यापार में जो सर्वप्रथम हेतुभूत है, उस चिदात्मा की हम लोग उपासना
करते हैं